श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 114: भरत के द्वारा अयोध्या की दुरवस्था का दर्शन तथा अन्तःपुर में प्रवेश करके भरत का दुःखी होना  »  श्लोक 9
 
 
श्लोक  2.114.9 
गोष्ठमध्ये स्थितामार्तामचरन्तीं नवं तृणम्।
गोवृषेण परित्यक्तां गवां पत्नीमिवोत्सुकाम्॥ ९॥
 
 
अनुवाद
जैसे गाय सहवास की इच्छा से बैल से अलग हो जाती है और घास चरना छोड़ देती है और व्याकुल होकर गौशाला में बंधी खड़ी रहती है, वैसे ही अयोध्यापुरी भी आन्तरिक पीड़ा से पीड़ित थी॥9॥
 
Just as a cow is separated from the bull in eagerness to mate with it and stops grazing on fresh grass and stands tied up in the cowshed in a distressed state, similarly Ayodhyapuri too was suffering from internal pain.॥ 9॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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