श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 114: भरत के द्वारा अयोध्या की दुरवस्था का दर्शन तथा अन्तःपुर में प्रवेश करके भरत का दुःखी होना  »  श्लोक 8
 
 
श्लोक  2.114.8 
त्यक्तां यज्ञायुधै: सर्वैरभिरूपैश्च याजकै:।
सुत्याकाले सुनिर्वृत्ते वेदिं गतरवामिव॥ ८॥
 
 
अनुवाद
यज्ञकाल के अन्त में जैसे 'स्फ्य' आदि यज्ञास्त्रों और श्रेष्ठ पुरोहितों से भरी हुई वेदी मन्त्रों की ध्वनि से रहित हो जाती है, उसी प्रकार अयोध्या भी सूनी हो गई॥8॥
 
At the end of the Yagya period, just as the altar filled with sacrificial weapons like 'Sfya' and the best priests becomes devoid of the sound of mantras chanting, similarly Ayodhya appeared deserted. 8॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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