श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 114: भरत के द्वारा अयोध्या की दुरवस्था का दर्शन तथा अन्तःपुर में प्रवेश करके भरत का दुःखी होना  »  श्लोक 6
 
 
श्लोक  2.114.6 
विध्वस्तकवचां रुग्णगजवाजिरथध्वजाम्।
हतप्रवीरामापन्नां चमूमिव महाहवे॥ ६॥
 
 
अनुवाद
उस समय अयोध्या ऐसी प्रतीत हो रही थी मानो किसी महायुद्ध में संकटग्रस्त सेना हो, जिसके कवच कटे हुए हों, हाथी, घोड़े, रथ और ध्वजाएँ टुकड़े-टुकड़े हो गई हों तथा मुख्य योद्धा मारे गए हों।
 
At that time Ayodhya appeared like an army in distress in a great war, with its armour cut off, elephants, horses, chariots and flags torn to pieces and the main warriors killed.
 ✨ ai-generated
 
 
  Connect Form
  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
  © 2026 vedamrit.in All Rights Reserved. Developed by AmritChaitanyaDas