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श्लोक 2.114.29  |
तदा तदन्त:पुरमुज्झितप्रभं
सुरैरिवोत्कृष्टमभास्करं दिनम्।
निरीक्ष्य सर्वत्र विभक्तमात्मवान्
मुमोच बाष्पं भरत: सुदु:खित:॥ २९॥ |
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| अनुवाद |
| जैसे सूर्य के अस्त हो जाने पर दिन की शोभा लुप्त हो जाती है और देवता शोक करने लगते हैं, उसी प्रकार उस समय भीतरी भवन शोभाहीन हो गया था और वहाँ के लोग शोक में डूबे हुए थे। उसे सब ओर से स्वच्छता और सजावट से रहित देखकर भरत धैर्य रखते हुए भी अत्यन्त दुःखी हुए और आँसू बहाने लगे। |
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| Just as the beauty of the day vanishes when the sun sets and the gods start mourning, similarly at that time the inner palace had become unattractive and the people there were immersed in grief. Seeing it devoid of cleanliness and decoration from all sides, Bharata, despite being patient, became very sad and started shedding tears. |
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इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽयोध्याकाण्डे चतुर्दशाधिकशततम: सर्ग:॥ ११४॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अयोध्याकाण्डमें एक सौ चौदहवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ११४॥ |
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