श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 114: भरत के द्वारा अयोध्या की दुरवस्था का दर्शन तथा अन्तःपुर में प्रवेश करके भरत का दुःखी होना  »  श्लोक 18
 
 
श्लोक  2.114.18 
भरतस्तु रथस्थ: सन् श्रीमान् दशरथात्मज:।
वाहयन्तं रथश्रेष्ठं सारथिं वाक्यमब्रवीत्॥ १८॥
 
 
अनुवाद
रथ पर बैठे हुए श्रीमान् दशरथ के पुत्र भरत उस समय उत्तम रथ को चलाने वाले सारथि सुमन्तराम से इस प्रकार बोले - ॥18॥
 
Sitting on the chariot, Shriman Dasharathan's son Bharata spoke thus to the charioteer Sumantram who was driving the excellent chariot at that time - ॥18॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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