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ramayan 2.114.14: (उन दिनों अयोध्या की सड़कें न तो बुहारी गई थीं और न ही साफ की गई थीं, इसलिए कूड़े-कचरे के ढेर इधर-उधर पड़े हुए थे। उस समय) वह नगरी उस निर्जन मधुशाला के समान वीरान दिखाई दे रही थी, जिसकी सफाई न की गई हो, जहाँ मदिरा से भरे हुए टूटे हुए प्याले पड़े हों और जहाँ पीने वाले भी मर गए हों॥ 14॥   |   ramayan सर्ग 2.114: भरत के द्वारा अयोध्या की दुरवस्था का दर्शन तथा अन्तःपुर में प्रवेश करके भरत का दुःखी होना   ।   ramayan काण्ड 2: अयोध्या काण्ड   ।   श्रीमद् वाल्मीकि रामायण Srimad Valmiki Ramayana | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 114: भरत के द्वारा अयोध्या की दुरवस्था का दर्शन तथा अन्तःपुर में प्रवेश करके भरत का दुःखी होना  »  श्लोक 14
 
 
श्लोक  2.114.14 
क्षीणपानोत्तमैर्भग्नै: शरावैरभिसंवृताम्।
हतशौण्डामिव ध्वस्तां पानभूमिमसंस्कृताम्॥ १४॥
 
 
अनुवाद
(उन दिनों अयोध्या की सड़कें न तो बुहारी गई थीं और न ही साफ की गई थीं, इसलिए कूड़े-कचरे के ढेर इधर-उधर पड़े हुए थे। उस समय) वह नगरी उस निर्जन मधुशाला के समान वीरान दिखाई दे रही थी, जिसकी सफाई न की गई हो, जहाँ मदिरा से भरे हुए टूटे हुए प्याले पड़े हों और जहाँ पीने वाले भी मर गए हों॥ 14॥
 
(In those days the roads of Ayodhya had not been swept and cleaned, so heaps of rubbish were lying here and there. At that time) that city looked desolate like a deserted drinking place (Madhushala) which had not been cleaned, where broken cups filled with wine were lying and where the drinkers had also perished.॥ 14॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)