श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 114: भरत के द्वारा अयोध्या की दुरवस्था का दर्शन तथा अन्तःपुर में प्रवेश करके भरत का दुःखी होना  »  श्लोक 12
 
 
श्लोक  2.114.12 
पुष्पनद्धां वसन्तान्ते मत्तभ्रमरशालिनीम्।
द्रुतदावाग्निविप्लुष्टां क्लान्तां वनलतामिव॥ १२॥
 
 
अनुवाद
जैसे ग्रीष्म ऋतु में वन में फूलों से लदी हुई और मदमस्त मधुमक्खियों से सुशोभित होने वाली लता, जो अचानक दावानल में फंसकर सूख जाती है, उसी प्रकार पहले हर्षित अयोध्या अब दुःखी हो गई थी॥12॥
 
Like the creeper in the forest which used to be laden with flowers during the summer season and was adorned by the intoxicated bees, but then suddenly got entangled in a forest fire and withered away, the formerly joyous Ayodhya had now become sad.॥ 12॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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