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श्लोक 2.113.9  |
स याच्यमानो गुरुणा मया च दृढविक्रम:।
राघव: परमप्रीतो वसिष्ठं वाक्यमब्रवीत्॥ ९॥ |
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| अनुवाद |
| 'मुनि! भगवान् श्री राम अपने पराक्रम पर अडिग हैं। मैंने उनसे बहुत प्रार्थना की। गुरुजी ने भी उनसे निवेदन किया। तब वे बहुत प्रसन्न हुए और गुरुदेव वशिष्ठजी से इस प्रकार बोले -॥9॥ |
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| ‘Muni! Lord Shri Ram is firm on his prowess. I prayed to him a lot. Guruji also requested him. Then he became very happy and said this to Gurudev Vasishthaji -॥9॥ |
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