श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 113: भरत का भरद्वाज से मिलते हुए अयोध्या को लौट आना  »  श्लोक 12
 
 
श्लोक  2.113.12 
एते प्रयच्छ संहृष्ट: पादुके हेमभूषिते।
अयोध्यायां महाप्राज्ञ योगक्षेमकरो भव॥ १२॥
 
 
अनुवाद
महाप्रज्ञ! आप प्रसन्नतापूर्वक ये स्वर्णपादपादि अपने प्रतिनिधि भरत को दीजिए और इनके द्वारा अयोध्या का कल्याण कीजिए।
 
‘Mahapragya! You happily give these golden sandals to Bharat as your representative and through them maintain the welfare of Ayodhya.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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