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ramayan 2.113.1: तत्पश्चात श्री रामचन्द्रजी के दोनों चरणों को सिर पर रखकर भरत शत्रुघ्न के साथ प्रसन्नतापूर्वक रथ पर बैठ गए॥1॥   |   ramayan सर्ग 2.113: भरत का भरद्वाज से मिलते हुए अयोध्या को लौट आना   ।   ramayan काण्ड 2: अयोध्या काण्ड   ।   श्रीमद् वाल्मीकि रामायण Srimad Valmiki Ramayana | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 113: भरत का भरद्वाज से मिलते हुए अयोध्या को लौट आना  »  श्लोक 1
 
 
श्लोक  2.113.1 
तत: शिरसि कृत्वा तु पादुके भरतस्तदा।
आरुरोह रथं हृष्ट: शत्रुघ्नसहितस्तदा॥ १॥
 
 
अनुवाद
तत्पश्चात श्री रामचन्द्रजी के दोनों चरणों को सिर पर रखकर भरत शत्रुघ्न के साथ प्रसन्नतापूर्वक रथ पर बैठ गए॥1॥
 
Thereafter, placing both the feet of Shri Ramchandraji on his head, Bharat happily sat on the chariot with Shatrughan. 1॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)