| श्रीमद् वाल्मीकि रामायण » काण्ड 2: अयोध्या काण्ड » सर्ग 112: ऋषियों का भरत को श्रीराम की आज्ञा के अनुसार लौट जाने की सलाह देना, भरत का पुनः प्रार्थना करना, श्रीराम का उन्हें चरणपादुका देकर विदा करना » श्लोक 30 |
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| | | | श्लोक 2.112.30  | अथानुपूर्व्या प्रतिपूज्य तं जनं
गुरूंश्च मन्त्रीन् प्रकृतीस्तथानुजौ।
व्यसर्जयद् राघववंशवर्धन:
स्थित: स्वधर्मे हिमवानिवाचल:॥ ३०॥ | | | | | | अनुवाद | | तत्पश्चात् हिमालय के समान अपने धर्म पर दृढ़ रहने वाले रघुवंशवर्धन श्री राम ने वहाँ उपस्थित लोगों, क्रमशः गुरु, मन्त्रियों, प्रजाजनों तथा दोनों भाइयों को यथोचित आदर-सत्कार देकर विदा किया। | | | | Thereafter, Raghuvanshvardhan Shri Ram, who was steadfast in his dharma like the Himalayas, bid farewell to the people present there, the Guru, the ministers, the subjects and the two brothers respectively, after giving them proper respect. | | ✨ ai-generated | | |
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