श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 112: ऋषियों का भरत को श्रीराम की आज्ञा के अनुसार लौट जाने की सलाह देना, भरत का पुनः प्रार्थना करना, श्रीराम का उन्हें चरणपादुका देकर विदा करना  »  श्लोक 19
 
 
श्लोक  2.112.19 
कामाद् वा तात लोभाद् वा मात्रा तुभ्यमिदं कृतम्।
न तन्मनसि कर्तव्यं वर्तितव्यं च मातृवत्॥ १९॥
 
 
अनुवाद
'पिताजी! माता कैकेयी ने काम या लोभ से आपके लिए जो कुछ किया है, उसे मन में न लाओ और सदैव उनके साथ वैसा ही व्यवहार करो जैसा अपनी पूजनीय माता के साथ करना उचित है।'॥19॥
 
'Father! Whatever mother Kaikeyi has done for you out of desire or greed, do not bring it to mind and always behave towards her in the same manner as is appropriate to behave towards one's revered mother.'॥ 19॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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