श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 112: ऋषियों का भरत को श्रीराम की आज्ञा के अनुसार लौट जाने की सलाह देना, भरत का पुनः प्रार्थना करना, श्रीराम का उन्हें चरणपादुका देकर विदा करना  »  श्लोक 18
 
 
श्लोक  2.112.18 
लक्ष्मीश्चन्द्रादपेयाद् वा हिमवान् वा हिमं त्यजेत्।
अतीयात् सागरो वेलां न प्रतिज्ञामहं पितु:॥ १८॥
 
 
अनुवाद
'चन्द्रमा अपनी चमक खो दे, हिमालय अपनी बर्फ त्याग दे, समुद्र अपनी सीमा लांघ जाए, परन्तु मैं अपने पिता की प्रतिज्ञा नहीं तोड़ सकता।॥18॥
 
'The moon may lose its radiance, the Himalayas may abandon their snow, or the ocean may exceed its limits, but I cannot break my father's promise.॥ 18॥
 ✨ ai-generated
 
 
  Connect Form
  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
  © 2026 vedamrit.in All Rights Reserved. Developed by acd