श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 112: ऋषियों का भरत को श्रीराम की आज्ञा के अनुसार लौट जाने की सलाह देना, भरत का पुनः प्रार्थना करना, श्रीराम का उन्हें चरणपादुका देकर विदा करना  »  श्लोक 17
 
 
श्लोक  2.112.17 
अमात्यैश्च सुहृद्भिश्च बुद्धिमद्भिश्च मन्त्रिभि:।
सर्वकार्याणि सम्मन्त्र्य महान्त्यपि हि कारय॥ १७॥
 
 
अनुवाद
इसके अतिरिक्त अपने मन्त्रियों, मित्रों और बुद्धिमान् मन्त्रियों से सलाह लेकर, चाहे कितने ही बड़े काम क्यों न हों, उनसे करवाओ॥17॥
 
‘Besides this, take advice from your ministers, friends and wise counsellors and get all the works, no matter how big, done through them.॥ 17॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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