श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 112: ऋषियों का भरत को श्रीराम की आज्ञा के अनुसार लौट जाने की सलाह देना, भरत का पुनः प्रार्थना करना, श्रीराम का उन्हें चरणपादुका देकर विदा करना  »  श्लोक 11
 
 
श्लोक  2.112.11 
रक्षितुं सुमहद् राज्यमहमेकस्तु नोत्सहे।
पौरजानपदांश्चापि रक्तान् रञ्जयितुं तदा॥ ११॥
 
 
अनुवाद
‘मैं अकेला इस विशाल राज्य की रक्षा नहीं कर सकता और इस नगर तथा जनपद के लोगों को, जो आपके चरणों में भक्ति रखते हैं, आपके बिना सुखी नहीं रख सकता।॥ 11॥
 
‘I alone cannot protect this vast kingdom and I cannot keep the people of this city and district, who have devotion towards your feet, happy without you.॥ 11॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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