श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 111: श्रीराम को पिता की आज्ञा के पालन से विरत होते न देख भरत का धरना देने को तैयार होना तथा श्रीराम का उन्हें समझाकर अयोध्या लौटने की आज्ञा देना  »  श्लोक 6
 
 
श्लोक  2.111.6 
वृद्धाया धर्मशीलाया मातुर्नार्हस्यवर्तितुम्।
अस्या हि वचनं कुर्वन् नातिवर्ते: सतां गतिम्॥ ६॥
 
 
अनुवाद
'तुम्हें अपनी धर्मपरायण वृद्धा माता की बातों की कभी उपेक्षा नहीं करनी चाहिए। उनकी आज्ञा का पालन करने से तुम उस धर्म का उल्लंघन करने वाले नहीं कहलाओगे जो सज्जनों का आश्रय है।'
 
‘You should never ignore the words of your pious old mother. By obeying her instructions you will not be considered a violator of the Dharma which is the refuge of noble men. 6.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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