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श्लोक 2.111.32  |
वृतो राजा हि कैकेय्या मया तद्वचनं कृतम्।
अनृतान्मोचयानेन पितरं तं महीपतिम्॥ ३२॥ |
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| अनुवाद |
| 'कैकेयी ने राजा से वर माँगा था और मैंने उसकी पूर्ति स्वीकार कर ली थी। अतः भरत! अब तुम मेरी आज्ञा मानो और उस वर को पूर्ण करके अपने पिता राजा दशरथ को मिथ्यात्व के बंधन से मुक्त करो।'॥32॥ |
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| 'Kaikeyi asked for a boon from the King and I accepted its fulfillment. So Bharata! Now you obey me and by fulfilling that boon, free your father King Dasharath from the bondage of falsehood.'॥ 32॥ |
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इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽयोध्याकाण्डे एकादशाधिकशततम: सर्ग:॥ १११॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अयोध्याकाण्डमें एक सौ ग्यारहवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ १११॥ |
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