श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 111: श्रीराम को पिता की आज्ञा के पालन से विरत होते न देख भरत का धरना देने को तैयार होना तथा श्रीराम का उन्हें समझाकर अयोध्या लौटने की आज्ञा देना  »  श्लोक 31
 
 
श्लोक  2.111.31 
अनेन धर्मशीलेन वनात् प्रत्यागत: पुन:।
भ्रात्रा सह भविष्यामि पृथिव्या: पतिरुत्तम:॥ ३१॥
 
 
अनुवाद
'जब मैं चौदह वर्ष की अवधि पूरी करके वन से लौटूँगा, तब अपने धर्मात्मा भाई के साथ इस लोक का श्रेष्ठ राजा होऊँगा।॥31॥
 
'When I return from the forest after completing the period of fourteen years, then along with my virtuous brother, I will be the best king of this world.॥ 31॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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