अथोत्थाय जलं स्पृष्ट्वा भरतो वाक्यमब्रवीत्।
शृण्वन्तु मे परिषदो मन्त्रिण: शृणुयुस्तथा॥ २४॥
न याचे पितरं राज्यं नानुशासामि मातरम्।
एवं परमधर्मज्ञं नानुजानामि राघवम्॥ २५॥
अनुवाद
यह सुनकर भरत उठ खड़े हुए और श्री रामजी तथा जल का स्पर्श करके बोले - 'मेरे सब दरबारी और मंत्रीगण सुन लें - न तो मैंने अपने पिता से राज्य माँगा, न माता से ही कभी इस विषय में कुछ कहा। और न धर्म के महान ज्ञाता श्री रामचन्द्रजी के वनवास से ही मैं सहमत हूँ।॥ 24-25॥
Hearing this, Bharat stood up and after touching Shri Ram and the water, said - 'All my courtiers and ministers should listen - neither did I ask for the kingdom from my father nor did I ever say anything about it to my mother. Also, I do not agree with the exile of Shri Ramchandraji, who is a great knower of Dharma.॥ 24-25॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥