श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 111: श्रीराम को पिता की आज्ञा के पालन से विरत होते न देख भरत का धरना देने को तैयार होना तथा श्रीराम का उन्हें समझाकर अयोध्या लौटने की आज्ञा देना  »  श्लोक 21
 
 
श्लोक  2.111.21 
एषोऽपि हि महाभाग: पितुर्वचसि तिष्ठति।
अत एव न शक्ता: स्मो व्यावर्तयितुमञ्जसा॥ २१॥
 
 
अनुवाद
परन्तु ये महान् श्री रामचन्द्रजी भी अपने पिता की आज्ञा का पालन करने में लगे हुए हैं, अतः यह भी उचित है। अतः हम उन्हें उस दिशा से अचानक वापस नहीं लौटा सकते।॥21॥
 
‘But this great Sri Ramachandraji is also engaged in obeying the orders of his father, so this is also right. Therefore we are unable to turn him back from that direction suddenly.’॥ 21॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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