श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 111: श्रीराम को पिता की आज्ञा के पालन से विरत होते न देख भरत का धरना देने को तैयार होना तथा श्रीराम का उन्हें समझाकर अयोध्या लौटने की आज्ञा देना  »  श्लोक 18
 
 
श्लोक  2.111.18 
उत्तिष्ठ नरशार्दूल हित्वैतद् दारुणं व्रतम्।
पुरवर्यामित: क्षिप्रमयोध्यां याहि राघव॥ १८॥
 
 
अनुवाद
'हे रघुनन्दन! इस कठोर व्रत को त्यागकर, उठकर शीघ्र ही यहाँ से अयोध्यापुरी चले जाइए।
 
'So great Raghunandan! Abandon this harsh fast, get up and go to Ayodhyapuri quickly from here.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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