| श्रीमद् वाल्मीकि रामायण » काण्ड 2: अयोध्या काण्ड » सर्ग 11: कैकेयी का राजा को दो वरों का स्मरण दिलाकर भरत के लिये अभिषेक और राम के लिये चौदह वर्षों का वनवास माँगना » श्लोक 23-25h |
|
| | | | श्लोक 2.11.23-25h  | तत: परमुवाचेदं वरदं काममोहितम्।
वरौ देयौ त्वया देव तदा दत्तौ महीपते॥ २३॥
तौ तावदहमद्यैव वक्ष्यामि शृणु मे वच:।
अभिषेकसमारम्भो राघवस्योपकल्पित:॥ २४॥
अनेनैवाभिषेकेण भरतो मेऽभिषिच्यताम्। | | | | | | अनुवाद | | तदनन्तर काम से मोहित होकर कैकेयी ने वरदान देने को तत्पर राजा से कहा, 'प्रभो! पृथ्वीनाथ! आपने उन दिनों मुझे जो दो वरदान देने की प्रतिज्ञा की थी, अब आप उन्हें मुझे दे दीजिए। मैं अब उन दो वरदानों को कहती हूँ - कृपया मेरी बात सुनिए - श्री राम के राज्याभिषेक की जो तैयारियाँ हो चुकी हैं, उन्हीं अभिषेक सामग्रियों से मेरे पुत्र भरत का अभिषेक किया जाए।' | | | | Thereafter Kaikeyi, infatuated with lust, said to the king who was ready to grant a boon, 'Lord! Prithvinath! The two boons that you had promised to give me those days, you should now give them to me. I will tell those two boons now - please listen to me - the preparations that have been made for Shri Ram's coronation, my son Bharat should be anointed with the same anointment materials. | | ✨ ai-generated | | |
|
|