श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 11: कैकेयी का राजा को दो वरों का स्मरण दिलाकर भरत के लिये अभिषेक और राम के लिये चौदह वर्षों का वनवास माँगना  »  श्लोक 21
 
 
श्लोक  2.11.21 
तत् प्रतिश्रुत्य धर्मेण न चेद् दास्यसि मे वरम्।
अद्यैव हि प्रहास्यामि जीवितं त्वद्विमानिता॥ २१॥
 
 
अनुवाद
'यदि आप इस धर्मपूर्ण प्रतिज्ञा के पश्चात् भी मुझे वे वरदान नहीं देंगे, तो मैं आपके द्वारा अपने को अपमानित समझकर आज ही अपने प्राण त्याग दूँगा।'
 
'If you do not grant me those boons after taking this righteous vow, then considering myself insulted by you, I will give up my life today itself.'
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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