| श्रीमद् वाल्मीकि रामायण » काण्ड 2: अयोध्या काण्ड » सर्ग 11: कैकेयी का राजा को दो वरों का स्मरण दिलाकर भरत के लिये अभिषेक और राम के लिये चौदह वर्षों का वनवास माँगना » श्लोक 14-15 |
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| | | | श्लोक 2.11.14-15  | चन्द्रादित्यौ नभश्चैव ग्रहा रात्र्यहनी दिश:।
जगच्च पृथिवी चेयं सगन्धर्वा: सराक्षसा:॥ १४॥
निशाचराणि भूतानि गृहेषु गृहदेवता:।
यानि चान्यानि भूतानि जानीयुर्भाषितं तव॥ १५॥ | | | | | | अनुवाद | | ‘चन्द्रमा, सूर्य, आकाश, ग्रह, रात्रि, दिन, दिशाएँ, जगत्, यह पृथ्वी, गन्धर्व, राक्षस, रात्रि में विचरण करने वाले प्राणी, गृहदेवता और इनके अतिरिक्त जितने भी प्राणी हैं, वे सब आपकी कही हुई बात को जानें और आपके वचनों के साक्षी बनें।॥14-15॥ | | | | ‘The moon, the sun, the sky, the planets, the night, the day, the directions, the world, this earth, the Gandharvas, the demons, the creatures that move about at night, the household deities and all the creatures besides these, may they all know what you say and become witnesses to your words.॥ 14-15॥ | | ✨ ai-generated | | |
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