| श्रीमद् वाल्मीकि रामायण » काण्ड 2: अयोध्या काण्ड » सर्ग 109: श्रीराम के द्वारा जाबालि के नास्तिक मत का खण्डन करके आस्तिक मत का स्थापन » श्लोक 36 |
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| | | | श्लोक 2.109.36  | धर्मे रता: सत्पुरुषै: समेता-
स्तेजस्विनो दानगुणप्रधाना:।
अहिंसका वीतमलाश्च लोके
भवन्ति पूज्या मुनय: प्रधाना:॥ ३६॥ | | | | | | अनुवाद | | जो धर्म में तत्पर हैं, सत्पुरुषों की संगति करते हैं, तेज से युक्त हैं, जिनमें दान का गुण प्रधान है, जो किसी प्राणी को कष्ट नहीं देते और जो अशुद्धियों के संग से रहित हैं, ऐसे महात्मा संसार में पूजनीय हैं।॥36॥ | | | | 'Those who are devoted to Dharma, keep company with good men, are endowed with brilliance, in whom the virtue of charity predominates, who never harms any living being and who are free from the company of impurities, such great sages are worthy of worship in the world.'॥ 36॥ | | ✨ ai-generated | | |
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