श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 109: श्रीराम के द्वारा जाबालि के नास्तिक मत का खण्डन करके आस्तिक मत का स्थापन  »  श्लोक 32
 
 
श्लोक  2.109.32 
तेनैवमाज्ञाय यथावदर्थ-
मेकोदयं सम्प्रतिपद्य विप्रा:।
धर्मं चरन्त: सकलं यथावत्
कांक्षन्ति लोकागममप्रमत्ता:॥ ३२॥
 
 
अनुवाद
'सत्पुरुषों के इस कथन के अनुसार धर्म के स्वरूप को जानकर तथा युक्तिपूर्वक उसका उचित निर्णय करके, किसी निष्कर्ष पर पहुँचे हुए तथा धर्म का भलीभाँति पालन करने वाले सावधान ब्राह्मण उन उत्तम लोकों को प्राप्त करना चाहते हैं ॥32॥
 
'According to this statement of the good men, after knowing the nature of Dharma and making its correct decision with the help of suitable reasoning, the careful Brahmins who have reached a conclusion and follow the Dharma well, want to attain those best worlds. 32॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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