श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 109: श्रीराम के द्वारा जाबालि के नास्तिक मत का खण्डन करके आस्तिक मत का स्थापन  »  श्लोक 30
 
 
श्लोक  2.109.30 
अमृष्यमाण: पुनरुग्रतेजा
निशम्य तन्नास्तिकवाक्यहेतुम्।
अथाब्रवीत् तं नृपतेस्तनूजो
विगर्हमाणो वचनानि तस्य॥ ३०॥
 
 
अनुवाद
जाबालिक के परलोक के अस्तित्व का खंडन करने वाले पूर्वोक्त वचनों को सुनकर, भयंकर एवं तेजस्वी राजकुमार राम उन्हें सहन न कर पाने के कारण पुनः उन वचनों की निन्दा करते हुए उससे बोले -॥30॥
 
Having heard the aforesaid words of Jabalika refuting the existence of the other world, the fierce and illustrious Prince Rama being unable to tolerate them, once again spoke to him, condemning those words -॥ 30॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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