Deprecated: str_replace(): Passing null to parameter #3 ($subject) of type array|string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 7 ramayan 2.109.27: 'मैंने निश्चय कर लिया है कि क्या करना चाहिए और क्या नहीं करना चाहिए। अतः फल-मूल आदि से पाँचों इन्द्रियों को तृप्त करके मैं निष्कपटता और भक्तिपूर्वक लोकयात्रा (पिता की आज्ञा के अनुसार आचरण) करूँगा। 27॥ | ramayan सर्ग 2.109: श्रीराम के द्वारा जाबालि के नास्तिक मत का खण्डन करके आस्तिक मत का स्थापन । ramayan काण्ड 2: अयोध्या काण्ड । श्रीमद् वाल्मीकि रामायण Srimad Valmiki Ramayana | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
संतुष्टपञ्चवर्गोऽहं लोकयात्रां प्रवाहये।
अकुह: श्रद्दधान: सन् कार्याकार्यविचक्षण:॥ २७॥
अनुवाद
'मैंने निश्चय कर लिया है कि क्या करना चाहिए और क्या नहीं करना चाहिए। अतः फल-मूल आदि से पाँचों इन्द्रियों को तृप्त करके मैं निष्कपटता और भक्तिपूर्वक लोकयात्रा (पिता की आज्ञा के अनुसार आचरण) करूँगा। 27॥
'I have decided what should be done and what should not be done. Therefore, after satisfying the five senses with fruits and roots etc., I will carry out the Lok Yatra (behavior in obedience to father's orders) with sincerity and devotion. 27॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥