श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 109: श्रीराम के द्वारा जाबालि के नास्तिक मत का खण्डन करके आस्तिक मत का स्थापन  »  श्लोक 18
 
 
श्लोक  2.109.18 
असत्यसंधस्य सतश्चलस्यास्थिरचेतस:।
नैव देवा न पितर: प्रतीच्छन्तीति न: श्रुतम्॥ १८॥
 
 
अनुवाद
'हमने सुना है कि जो चंचल मनवाला मनुष्य झूठी प्रतिज्ञा करके धर्म से विमुख हो जाता है, उसके द्वारा दिया गया तर्पण देवता और पितर स्वीकार नहीं करते।॥18॥
 
'We have heard that the gods and ancestors do not accept the oblations given by a person of fickle mind who deviates from Dharma by making false promises.॥ 18॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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