श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 108: जाबालि का नास्तिकों के मत का अवलम्बन करके श्रीराम को समझाना  »  श्लोक 7
 
 
श्लोक  2.108.7 
पित्र्यं राज्यं समुत्सृज्य स नार्हसि नरोत्तम।
आस्थातुं कापथं दु:खं विषमं बहुकण्टकम्॥ ७॥
 
 
अनुवाद
अतः हे पुरुषश्रेष्ठ! तुम्हें अपने पिता का राज्य छोड़कर इस दुःखमय, ऊंचे-नीचे और कंटीले जंगल के इस बुरे मार्ग पर नहीं जाना चाहिए॥ 7॥
 
‘Therefore, O best of men! You should not leave your father's kingdom and follow this evil path of this sorrowful, up and down and thorny forest.॥ 7॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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