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श्लोक 2.108.7  |
पित्र्यं राज्यं समुत्सृज्य स नार्हसि नरोत्तम।
आस्थातुं कापथं दु:खं विषमं बहुकण्टकम्॥ ७॥ |
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| अनुवाद |
| अतः हे पुरुषश्रेष्ठ! तुम्हें अपने पिता का राज्य छोड़कर इस दुःखमय, ऊंचे-नीचे और कंटीले जंगल के इस बुरे मार्ग पर नहीं जाना चाहिए॥ 7॥ |
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| ‘Therefore, O best of men! You should not leave your father's kingdom and follow this evil path of this sorrowful, up and down and thorny forest.॥ 7॥ |
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