श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 108: जाबालि का नास्तिकों के मत का अवलम्बन करके श्रीराम को समझाना  »  श्लोक 17
 
 
श्लोक  2.108.17 
स नास्ति परमित्येतत् कुरु बुद्धिं महामते।
प्रत्यक्षं यत् तदातिष्ठ परोक्षं पृष्ठत: कुरु॥ १७॥
 
 
अनुवाद
अतः हे महात्मन! आप मन में निश्चय कर लें कि इस लोक के अतिरिक्त कोई दूसरा लोक नहीं है (अतः वहाँ फल भोगने के लिए धर्म आदि का पालन करने की आवश्यकता नहीं है)। राज्य के प्रत्यक्ष लाभ का आश्रय लें और अप्रत्यक्ष (परलोक के लाभ) को पीछे धकेल दें॥ 17॥
 
‘Therefore, O great one! You should decide in your mind that there is no other world except this one (therefore there is no need to follow Dharma etc. to enjoy the fruits there). Take shelter of the direct benefits of the kingdom and push the indirect (otherworldly benefits) behind.॥ 17॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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