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ramayan 2.108.16: जो शास्त्र हमें यज्ञ करने, देवताओं की पूजा करने, दान देने, यज्ञ में दीक्षा लेने, तप करने, गृहत्याग करने और संन्यासी बनने आदि के लिए कहते हैं, वे सब बुद्धिमान पुरुषों ने केवल लोगों को दान की ओर प्रवृत्त करने के उद्देश्य से ही लिखे हैं॥ 16॥   |   ramayan सर्ग 2.108: जाबालि का नास्तिकों के मत का अवलम्बन करके श्रीराम को समझाना   ।   ramayan काण्ड 2: अयोध्या काण्ड   ।   श्रीमद् वाल्मीकि रामायण Srimad Valmiki Ramayana | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 108: जाबालि का नास्तिकों के मत का अवलम्बन करके श्रीराम को समझाना  »  श्लोक 16
 
 
श्लोक  2.108.16 
दानसंवनना ह्येते ग्रन्था मेधाविभि: कृता:।
यजस्व देहि दीक्षस्व तपस्तप्यस्व संत्यज॥ १६॥
 
 
अनुवाद
जो शास्त्र हमें यज्ञ करने, देवताओं की पूजा करने, दान देने, यज्ञ में दीक्षा लेने, तप करने, गृहत्याग करने और संन्यासी बनने आदि के लिए कहते हैं, वे सब बुद्धिमान पुरुषों ने केवल लोगों को दान की ओर प्रवृत्त करने के उद्देश्य से ही लिखे हैं॥ 16॥
 
'The scriptures which tell us to perform sacrifices and worship the gods, give alms, take initiation in sacrifices, perform austerities, renounce home and become a hermit, etc., have been written by wise men with the sole purpose of making people inclined towards charity.॥ 16॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)