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ramayan 2.108.15: 'यदि दूसरे का खाया हुआ अन्न दूसरे के शरीर में चला जाए, तो परदेश जाने वालों का श्राद्ध करना चाहिए; उन्हें यात्रा के लिए अन्न देना उचित नहीं है ॥15॥   |   ramayan सर्ग 2.108: जाबालि का नास्तिकों के मत का अवलम्बन करके श्रीराम को समझाना   ।   ramayan काण्ड 2: अयोध्या काण्ड   ।   श्रीमद् वाल्मीकि रामायण Srimad Valmiki Ramayana | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 108: जाबालि का नास्तिकों के मत का अवलम्बन करके श्रीराम को समझाना  »  श्लोक 15
 
 
श्लोक  2.108.15 
यदि भुक्तमिहान्येन देहमन्यस्य गच्छति।
दद्यात् प्रवसतां श्राद्धं न तत् पथ्यशनं भवेत्॥ १५॥
 
 
अनुवाद
'यदि दूसरे का खाया हुआ अन्न दूसरे के शरीर में चला जाए, तो परदेश जाने वालों का श्राद्ध करना चाहिए; उन्हें यात्रा के लिए अन्न देना उचित नहीं है ॥15॥
 
'If the food eaten by someone else goes into someone else's body, then Shraddha should be performed for those going to a foreign country; It is not appropriate to give them food for the journey. 15॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)