श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 108: जाबालि का नास्तिकों के मत का अवलम्बन करके श्रीराम को समझाना  »  श्लोक 1
 
 
श्लोक  2.108.1 
आश्वासयन्तं भरतं जाबालिर्ब्राह्मणोत्तम:।
उवाच रामं धर्मज्ञं धर्मापेतमिदं वच:॥ १॥
 
 
अनुवाद
जब धर्मज्ञ मुनि श्री रामचन्द्रजी भरत को इस प्रकार उपदेश दे रहे थे, उसी समय ब्राह्मण शिरोमणि जाबालि ने उनसे यह धर्म-विरोधी वचन कहा-॥1॥
 
When the religious sage Shri Ramchandraji was admonishing Bharat in this way, at the same time Brahmin Shiromani Jabali said to him this anti-religious word -॥ 1॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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