श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 107: श्रीराम का भरत को समझाकर उन्हें अयोध्या जाने का आदेश देना  »  श्लोक 18
 
 
श्लोक  2.107.18 
छायां ते दिनकरभा: प्रबाधमानं
वर्षत्रं भरत करोतु मूर्ध्नि शीताम्।
एतेषामहमपि काननद्रुमाणां
छायां तामतिशयिनीं शनै: श्रयिष्ये॥ १८॥
 
 
अनुवाद
'भारत! सूर्य की किरणों को दूर करने वाला यह छत्र तुम्हारे सिर पर शीतल छाया डाले। अब मैं भी धीरे-धीरे इन वन्य वृक्षों की घनी छाया में आश्रय लूँगा॥ 18॥
 
'Bharat! May the umbrella that dispels the sun's rays cast a cool shadow on your head. Now I too will gradually take shelter in the dense shade of these wild trees.॥ 18॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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