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ramayan 2.106.20: 'ऐसा कौन क्षत्रिय होगा, जो प्रजापालनरूपी धर्म को, जो तत्काल सुख का साधन है, त्यागकर, संदेह पर आधारित, सुख के लक्षण से रहित, भविष्य में अनिश्चित फल देने वाले धर्म का आचरण करेगा? 20॥   |   ramayan सर्ग 2.106: भरत की पुनः श्रीराम से अयोध्या लौटने और राज्य ग्रहण करने की प्रार्थना   ।   ramayan काण्ड 2: अयोध्या काण्ड   ।   श्रीमद् वाल्मीकि रामायण Srimad Valmiki Ramayana | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
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श्लोक  2.106.20 
कश्च प्रत्यक्षमुत्सृज्य संशयस्थमलक्षणम्।
आयतिस्थं चरेद् धर्मं क्षत्रबन्धुरनिश्चितम्॥ २०॥
 
 
अनुवाद
'ऐसा कौन क्षत्रिय होगा, जो प्रजापालनरूपी धर्म को, जो तत्काल सुख का साधन है, त्यागकर, संदेह पर आधारित, सुख के लक्षण से रहित, भविष्य में अनिश्चित फल देने वाले धर्म का आचरण करेगा? 20॥
 
'Who would be such a Kshatriya, who would abandon the religion of obeying the people, which is the means of immediate happiness, and would practice a religion based in doubt, devoid of signs of happiness, which would yield uncertain results in the future? 20॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)