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ramayan 2.106.18: 'कहाँ वनवास और कहाँ क्षात्रधर्म ? कहाँ जटा धारण करना और कहाँ प्रजापालन ? ऐसे परस्पर विरोधी कर्म नहीं करने चाहिए ॥18॥   |   ramayan सर्ग 2.106: भरत की पुनः श्रीराम से अयोध्या लौटने और राज्य ग्रहण करने की प्रार्थना   ।   ramayan काण्ड 2: अयोध्या काण्ड   ।   श्रीमद् वाल्मीकि रामायण Srimad Valmiki Ramayana | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
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श्लोक  2.106.18 
क्व चारण्यं क्व च क्षात्रं क्व जटा: क्व च पालनम्।
ईदृशं व्याहतं कर्म न भवान् कर्तुमर्हति॥ १८॥
 
 
अनुवाद
'कहाँ वनवास और कहाँ क्षात्रधर्म ? कहाँ जटा धारण करना और कहाँ प्रजापालन ? ऐसे परस्पर विरोधी कर्म नहीं करने चाहिए ॥18॥
 
'Where is exile and where is Kshatradharma? Where is wearing matted hair and where is taking care of the people? You should not perform such contradictory acts.॥ 18॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)