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को हि धर्मार्थयोर्हीनमीदृशं कर्म किल्बिषम्।
स्त्रिय: प्रियचिकीर्षु: सन् कुर्याद् धर्मज्ञ धर्मवित्॥ १२॥
अनुवाद
'धर्मज्ञ रघुनन्दन! ऐसा कौन पुरुष है जो धर्म को जानकर भी केवल स्त्री को प्रसन्न करने के लिए धर्म और अर्थ से रहित ऐसा नीच कर्म कर सकता है?॥12॥
'Dharmagya Raghunandan! Who is that man who, despite knowing the Dharma, can commit such a despicable act, devoid of Dharma and Artha, just for the sake of pleasing a woman?॥ 12॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥