श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 105: भरत का श्रीराम को राज्य ग्रहण करने के लिये कहना, श्रीराम का पिता की आज्ञा का पालन करने के लिये ही राज्य ग्रहण न करके वन में रहने का ही दृढ़ निश्चय बताना  »  श्लोक 33
 
 
श्लोक  2.105.33 
भृत्यानां भरणात् सम्यक् प्रजानां परिपालनात्।
अर्थादानाच्च धर्मेण पिता नस्त्रिदिवं गत:॥ ३३॥
 
 
अनुवाद
वे अपने योग्य कुटुम्बियों का पालन करते थे, प्रजा का पालन-पोषण करते थे तथा उनसे धर्मानुसार कर आदि के रूप में धन वसूल करते थे - इन्हीं सब कारणों से हमारे पिता उत्तम स्वर्ग को गये हैं॥ 33॥
 
‘He used to support his family who were capable of being supported. He used to take good care of his subjects and used to collect money from them in the form of taxes etc. in accordance with Dharma – due to all these reasons our father has gone to the best heaven.॥ 33॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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