श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 105: भरत का श्रीराम को राज्य ग्रहण करने के लिये कहना, श्रीराम का पिता की आज्ञा का पालन करने के लिये ही राज्य ग्रहण न करके वन में रहने का ही दृढ़ निश्चय बताना  »  श्लोक 32
 
 
श्लोक  2.105.32 
धर्मात्मा सुशुभै: कृत्स्नै: क्रतुभिश्चाप्तदक्षिणै:।
धूतपापो गत: स्वर्गं पिता न: पृथिवीपति:॥ ३२॥
 
 
अनुवाद
'महाराज! हमारे पिता जी पुण्यात्मा पुरुष थे। उन्होंने यथोचित दक्षिणा देकर प्रायः सभी शुभ यज्ञ सम्पन्न कराए थे। उनके समस्त पाप धुल गए थे। अतः वे महाराज स्वर्ग चले गए हैं।॥ 32॥
 
'Sir! Our father was a pious man. He had performed almost all the most auspicious yagnas by giving sufficient dakshina. All his sins were washed away. Therefore, that Maharaja has gone to heaven.॥ 32॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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