श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 105: भरत का श्रीराम को राज्य ग्रहण करने के लिये कहना, श्रीराम का पिता की आज्ञा का पालन करने के लिये ही राज्य ग्रहण न करके वन में रहने का ही दृढ़ निश्चय बताना  »  श्लोक 28
 
 
श्लोक  2.105.28 
नात्र कश्चिद् यथाभावं प्राणी समतिवर्तते।
तेन तस्मिन् न सामर्थ्यं प्रेतस्यास्त्यनुशोचत:॥ २८॥
 
 
अनुवाद
इस संसार में कोई भी प्राणी जन्म-मृत्यु के चक्र का उल्लंघन नहीं कर सकता, इसलिए जो व्यक्ति मृत व्यक्ति के लिए बार-बार शोक करता है, उसमें भी अपनी मृत्यु को टालने की शक्ति नहीं होती॥ 28॥
 
‘No being in this world can violate the cycle of birth and death which comes in due course. Therefore, even a person who repeatedly mourns for a dead person does not have the power to postpone his own death.॥ 28॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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