श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 105: भरत का श्रीराम को राज्य ग्रहण करने के लिये कहना, श्रीराम का पिता की आज्ञा का पालन करने के लिये ही राज्य ग्रहण न करके वन में रहने का ही दृढ़ निश्चय बताना  »  श्लोक 25
 
 
श्लोक  2.105.25 
हृष्यन्त्यृतुमुखं दृष्ट्वा नवं नवमिवागतम्।
ऋतूनां परिवर्तेन प्राणिनां प्राणसंक्षय:॥ २५॥
 
 
अनुवाद
लोग ऋतु के आरम्भ को देखकर हर्षित होते हैं, यह सोचकर कि अभी-अभी आई है (पहले कभी नहीं आई थी), परन्तु वे यह नहीं जानते कि ऋतुओं के परिवर्तन के साथ-साथ प्राणियों की आयु भी धीरे-धीरे क्षीण होती जाती है ॥25॥
 
People become delighted when they see the beginning of a season, thinking that it has just arrived (had never arrived before), but they do not know that with the change of seasons the life span of living beings is gradually diminishing. ॥25॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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