श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 105: भरत का श्रीराम को राज्य ग्रहण करने के लिये कहना, श्रीराम का पिता की आज्ञा का पालन करने के लिये ही राज्य ग्रहण न करके वन में रहने का ही दृढ़ निश्चय बताना  »  श्लोक 22
 
 
श्लोक  2.105.22 
सहैव मृत्युर्व्रजति सह मृत्युर्निषीदति।
गत्वा सुदीर्घमध्वानं सह मृत्युर्निवर्तते॥ २२॥
 
 
अनुवाद
‘मृत्यु मनुष्य के साथ चलती है, उसके साथ बैठती है, और बहुत दूर तक यात्रा करने पर भी मनुष्य के साथ ही लौटती है ॥ 22॥
 
‘Death walks with the man, sits with him, and even after travelling a long distance, it returns with the man.॥ 22॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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