श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 105: भरत का श्रीराम को राज्य ग्रहण करने के लिये कहना, श्रीराम का पिता की आज्ञा का पालन करने के लिये ही राज्य ग्रहण न करके वन में रहने का ही दृढ़ निश्चय बताना  »  श्लोक 18
 
 
श्लोक  2.105.18 
यथाऽऽगारं दृढस्थूणं जीर्णं भूत्वोपसीदति।
तथावसीदन्ति नरा जरामृत्युवशंगता:॥ १८॥
 
 
अनुवाद
जिस प्रकार दृढ़ स्तम्भों वाला मकान पुराना होने पर ढह जाता है, उसी प्रकार मनुष्य भी बुढ़ापे और मृत्यु से नष्ट हो जाते हैं॥18॥
 
‘Just as a house with strong pillars collapses when it gets old, similarly human beings are destroyed by old age and death.॥ 18॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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