श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 105: भरत का श्रीराम को राज्य ग्रहण करने के लिये कहना, श्रीराम का पिता की आज्ञा का पालन करने के लिये ही राज्य ग्रहण न करके वन में रहने का ही दृढ़ निश्चय बताना  »  श्लोक 17
 
 
श्लोक  2.105.17 
यथा फलानां पक्वानां नान्यत्र पतनाद् भयम्।
एवं नरस्य जातस्य नान्यत्र मरणाद् भयम्॥ १७॥
 
 
अनुवाद
‘जैसे पके हुए फलों को गिरने के सिवाय और कोई भय नहीं होता, वैसे ही नवजात मनुष्यों को मृत्यु के सिवाय और कोई भय नहीं होता।॥17॥
 
‘Just as ripe fruits have no fear except falling, similarly the newly born human beings have no fear except death.॥ 17॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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