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श्लोक 2.105.12  |
तथानुयाने काकुत्स्थ मत्ता नर्दन्तु कुञ्जरा:।
अन्त:पुरगता नार्यो नन्दन्तु सुसमाहिता:॥ १२॥ |
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| अनुवाद |
| 'ककुत्स्थकुलभूषण! जब आप इस प्रकार अयोध्या को लौटें, तब उन्मत्त हाथी गर्जना करें और अंतःपुर की स्त्रियाँ एकाग्रचित्त होकर हर्षपूर्वक आपका स्वागत करें।'॥12॥ |
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| 'Kakutsthakulbhushan! When you return to Ayodhya in this manner, the mad elephants should roar and the women of the harem should concentrate and greet you with joy.'॥ 12॥ |
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