श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 105: भरत का श्रीराम को राज्य ग्रहण करने के लिये कहना, श्रीराम का पिता की आज्ञा का पालन करने के लिये ही राज्य ग्रहण न करके वन में रहने का ही दृढ़ निश्चय बताना  »  श्लोक 12
 
 
श्लोक  2.105.12 
तथानुयाने काकुत्स्थ मत्ता नर्दन्तु कुञ्जरा:।
अन्त:पुरगता नार्यो नन्दन्तु सुसमाहिता:॥ १२॥
 
 
अनुवाद
'ककुत्स्थकुलभूषण! जब आप इस प्रकार अयोध्या को लौटें, तब उन्मत्त हाथी गर्जना करें और अंतःपुर की स्त्रियाँ एकाग्रचित्त होकर हर्षपूर्वक आपका स्वागत करें।'॥12॥
 
'Kakutsthakulbhushan! When you return to Ayodhya in this manner, the mad elephants should roar and the women of the harem should concentrate and greet you with joy.'॥ 12॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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