श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 105: भरत का श्रीराम को राज्य ग्रहण करने के लिये कहना, श्रीराम का पिता की आज्ञा का पालन करने के लिये ही राज्य ग्रहण न करके वन में रहने का ही दृढ़ निश्चय बताना  »  श्लोक 11
 
 
श्लोक  2.105.11 
श्रेणयस्त्वां महाराज पश्यन्त्वग्र‍‍्याश्च सर्वश:।
प्रतपन्तमिवादित्यं राज्यस्थितमरिंदमम्॥ ११॥
 
 
अनुवाद
महाराज! नाना जातियों और राज्य के प्रमुख लोगों का संघ, प्रचण्ड सूर्य के समान सिंहासन पर बैठे हुए शत्रुदमन नामक राजा को देखे॥11॥
 
‘Maharaj! The union of various castes and the chief heads of the kingdom should see the King of Shatrudaman sitting on the throne like the scorching Sun.॥ 11॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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