श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 104: श्रीराम, लक्ष्मण और सीता के द्वारा माताओं की चरणवन्दना तथा वसिष्ठजी को प्रणाम करके श्रीराम आदि का सबके साथ बैठना  »  श्लोक 32
 
 
श्लोक  2.104.32 
स राघव: सत्यधृतिश्च लक्ष्मणो
महानुभावो भरतश्च धार्मिक:।
वृता: सुहृद्भिश्च विरेजिरेऽध्वरे
यथा सदस्यै: सहितास्त्रयोऽग्नय:॥ ३२॥
 
 
अनुवाद
वे तीनों भाई श्री राम, महापुरुष सत्यपुरुष लक्ष्मण और धर्मात्मा भरत अपने मित्रों से घिरे हुए यज्ञशाला के सदस्यों से घिरी हुई त्रिविध अग्नि के समान शोभा पा रहे थे॥32॥
 
Those three brothers, Sri Ram, the great man of truth, Lakshman and the virtuous Bharat, surrounded by their friends, were looking beautiful like the threefold fire surrounded by the members of the yagyasahala. 32॥
 
इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽयोध्याकाण्डे चतुरधिकशततम: सर्ग:॥ १०४॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अयोध्याकाण्डमें एक सौ चारवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ १०४॥
 
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)