श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 104: श्रीराम, लक्ष्मण और सीता के द्वारा माताओं की चरणवन्दना तथा वसिष्ठजी को प्रणाम करके श्रीराम आदि का सबके साथ बैठना  »  श्लोक 14
 
 
श्लोक  2.104.14 
रामेणेङ्गुदिपिण्याकं पितुर्दत्तं समीक्ष्य मे।
कथं दु:खेन हृदयं न स्फोटति सहस्रधा॥ १४॥
 
 
अनुवाद
'श्री रामजी ने जब अपने पिता को इंगुदी का चूर्ण अर्पित किया है, तब मेरा हृदय शोक से हजार टुकड़ों में क्यों नहीं टूट गया?॥14॥
 
'Why doesn't my heart break into a thousand pieces in grief at the sight that Sri Rama has offered his father the powdered fruit of ingudi?॥ 14॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)