श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 103: श्रीराम आदि का विलाप, पिता के लिये जलाञ्जलि-दान, पिण्डदान और रोदन  »  श्लोक 49
 
 
श्लोक  2.103.49 
तत: स तेषां रुदतां महात्मनां
भुवं च खं चानुविनादयन् स्वन:।
गुहा गिरीणां च दिशश्च संततं
मृदङ्गघोषप्रतिमो विशुश्रुवे॥ ४९॥
 
 
अनुवाद
उस समय उन महात्माओं का विलाप पृथ्वी, आकाश, पर्वत कन्दराओं तथा सम्पूर्ण दिशाओं में ढोल की ध्वनि के समान गूँज रहा था।
 
At that time the wailing of those great souls seemed to reverberate throughout the earth, the sky, the mountain caves and all directions, like the sound of a drum. 49.
 
इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽयोध्याकाण्डे त्र्यधिकशततम: सर्ग:॥ १०३॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अयोध्याकाण्डमें एक सौ तीनवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ १०३॥
 
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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